Monday, 1 October 2012

तुम उस पार , मैं इस पार


  तुम उस पार , मैं इस पार
        बांधना चाहता हूँ ,
श्वांसों की झीनी नाजुक सी वो डोर.

मुझ को हिचक है तेरी गली में ,
तुझ को हिचक है मेरी गली में ,
         देखना चाहता हूँ ,
तेरी गली की सुर्ख रंगत लिए भोर .

चर्चा तुम्हारी खूब  मैंने सुनी है ,
चर्चा हमारी खूब तुमने सुनी है,
        मिलाना चाहता हूँ ,
कच्चे धागे के छिटके हुवे दो छोर .

सब लोग माने तुम हम से अलग हो ,
हम ने न माना तुम हम से अलग हो ,
        बताना चाहता हूँ ,
सदा से बसे हो मुझ में मेरे चितचोर.

लोग हंस के मारे  रोज पत्थरों से ,
महल भी चुना है उन्हीं पत्थरों से ,
         दिखाना चाहता हूँ ,
दर्द से भरा मेरे महल का पोर-पोर.

तुम्हें क्या पड़ी है जो सुध लो हमारी ,
हम नित्य सजाते छवि जो तुम्हारी ,
         ध्यान चाहता हूँ
घायल पंछी सा पहुंचा हूँ तेरे ही ठोर

No comments:

Post a Comment