Monday, 15 October 2012

एक तुम और एक मैं.


सागर के किनारे ,
अकेले टहलता हूँ ,
जब से अकेला हूँ ,
यह एकाकीपन आया
या ,
मैंने ओढ़ लिया ?
यह प्रश्न नहीं है ,
प्रश्न तो यह है -
तुम्हारे जाने के बाद ,
आखिर कर मेरी ,
श्वांस चलती कैसे है ?

समंदर की लहरें,
आती हैं
और लौट जाती हैं ,
जैसे तुम आ कर ,
लौट गयी थी.
हर बार लहर
आ कर गुदगुदाती है ,
और लौट कर ,
उदास कर जाती है ,
तुम इस के मायने ,
समझ सकती हो .

समंदर से लहरें ,
उठ-उठ कर आती हैं ,
और ,
आते-जाते ,
मिलते-मिलाते ,
विलीन हो जाती हैं,
या,
नये रंग -रूप में ,
फिर-फिर उठ आती हैं,
मेरी उम्मीदों को हमेशा,
ज़िंदा रखने के लिए .

सब लोग कहते हैं -
समुद्र एक है
और
लहरें अनेक हैं ,
मेरा इस में ,
कोई विरोध नहीं है ,
यह उनका दर्शन है ,
मेरा मानना है ,
समुद्र एक है .
और ,
लहरें दो ही हैं ,
एक तुम और एक मैं.

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