Tuesday, 12 February 2013

यादें ऐसे गुंथ गयी , फूल हो कपास का.



यादें ऐसे गुंथ गयी , फूल हो कपास का.
सोलह कलाएं लिए, चाँद हो आकाश का .

जिंदगी तकली बनी ,
गोल-गोल घूमती .
यादों का कपास लिए ,
नर्म सूत्र कातती .

बंध उन के खोल दूं  ,खेत हो कपास का .
यादें ऐसे गुंथ गयी , फूल हो कपास का.

दिन कमल सा खिले ,
यादों का सूरज लिए .
दिन कमल सा ढले ,
यादों का सूरज लिए .

यादें नित्य काटती , वेग प्रीत प्रवास का.
यादें ऐसे गुंथ गयी , फूल हो कपास का.

मोन की आयोजना में ,
सलवटें ही बोलती .
सच कहूं तो जिन्दगी ,
बावरी सी डोलती .

हर गली में शोर है , यादों के उजास का .
यादें ऐसे गुंथ गयी  , फूल हो कपास का.

                                           -त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द.

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