Thursday, 14 February 2013

अग्नि पे चुम्बन उगते हैं.


आशाओं  पर सब पलते हैं .
तप के ही अंकुवे निकले हैं .

मांझी सोचे ,
किश्ती लेकर .
घर आऊँगा ,
खुशियाँ लेकर .

कौन कहे वह ,
घर को आये .
कौन कहे वह ,
सागर बस जाए .

लहरों पर मांझी चलते हैं.
छोटी किश्ती पे मचले हैं.

वो दीवाने  ,
तट  आते हैं.
लहर पीट के ,
घर भरते हैं.

रात कटी है ,
अपने ले कर .
भोर चले फिर,
सपने ले कर .

झंझा पर सपने बसते हैं.
अग्नि पे चुम्बन उगते हैं.

कल उन का भी ,
घर होगा .
घर में किस का ,
डर होगा .

गर्म तवे से ,
गंध उठेगी .
मृदुल भुजाएं ,
अंक कसेगी.

आशाओं  पर घर चलते हैं .
पतझड़ पर बसंत फलते हैं .

                    - त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द.

.

No comments:

Post a Comment