Saturday, 2 February 2013

विकराल लहरों के नियंता



तू ने ही प्रेम की पींगे बढाई,
फिर मुझे कहा -
चल लहर पर चलते हैं ,
मैंने रोका था ,
पर तुम कहाँ मानने वाले ,
तुम पर प्रेम की खुमारी ,
इस तरह चढ़ चुकी थी ,
जैसे चढ़ गयी हो ,
अंगूर की बेटी .

लहरों की सवारी ,
इतनी आसान ,
नहीं हुआ करती,
हाँ ,
उन पर थोड़ी देर ,
जी जरूर बहलता है ,
परन्तु जैसे ही ,
ले लेती है विशाल रूप ,
तब दैत्याकार लहरें ,
नाग की तरह ,
लीलने को आतुर होती है ,
तब तुम्हारा प्रेम ,
कहीं हवा हो जाता है ,
और ,
सब कुछ हो जाता है बदरंग.

ऊपर-नीचे होते हुए ,
इतने डर जाते हो,
और ,
डर के मारे ,
सारा दोष
मेरे ही सर मढ़ देते हो,
यार ,
बहुत कायर हो ,
जो लहरों से डरते हो ,
मेरा हाथ छिड़क ,
निर्जीव नौका की ओर,
खींचे चले जाते हो ,
क्या यही तुम्हारे
प्रेम की है पराकाष्ठा ?

मेरी एक बात पर ,
तुम यकीन करो ,
ये तमाम लहरें ,
हमने ही उठाई है ,
क्योंकि,
हमने ही समंदर में,
गहरे तक झांका है ,
हमने ही तूफान
आमंत्रित किये हैं ,
और,
हमने ही ,भंवर पर भंवर
पैदा किये हैं ,
हाँ ,हम ही कारण हैं ,
हाँ ,हम ही कर्ता है ,
फिर तो हम ही हुए ना,
विकराल लहरों के नियंता ,
फिर डर काहे का.

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द.

No comments:

Post a Comment