Thursday, 20 November 2014

दलदल में धंसा कुरंग

कर लिए व्यतीत
साथ-साथ कुछ क्षण
जैसे धूप आई-गई
और छोड़ गई ऊष्मा
नर्म सम्बन्धों की।
वे तो हैं नहीं
अब सफर में कहीं
न दूर-दूर तक की
लौट आने की संभावना
फिर भी सम्बन्धों की प्रतीक्षा
बहुत सालती है
जैसे बर्फ बारी में
सुलगती आग की चुप्पी।
आज फिर से हादसे का
हो गया हूँ शिकार
कोई क्षण भर में ही
जीवन की वीणा के
तार छेड़ गया,
कुछ मोहक छंद कानों में
उंडेल गया
मानो बाँसों के जंगल में
रेशम सी हवा ने चल कर
वेणुवादन रचा दिया।
अब मैं फिर से
लौट कर वहीं पहुँचना चाहता
जहां से चला था
परंतु पैर उठते ही नहीं
जैसे दलदल में धंसा कुरंग
विवशताओं के रहते मरा जाता।
-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद (राज.)

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