अब तुम लौट आना

तमाम उम्र के गुजर जाने पर
तुम मिलोगे
जैसे थकी नदी से मिलता है
खारा समुद्र
नदी का मधुर जल भी
खार से मिल
म्लान होता है,
उस मिलन के लिए
बहुत चिंतित ।
तुम विशाल
आभा मण्डल भी
बहुत चमचमाता
जैसे चमकता सूरज,
परंतु दिनभर की
प्रखरता के बाद
सूरज धरा से मिलता
तब क्षितिज की ओर
मलिन होता चमचमाता सूरज
अंधेरे में गुम हो जाता है कहीं
यह भयावह लगता।
अधर तुम्हारे
नाम का जपन करते
पहले पपड़ाये
फिर फट गए
जैसे धरती दरक गयी,
हृदय अभी भी
नेह भाव से आर्द्र
जैसे बगीचे की क्यारी
नन्हें पौधों के लिए
उँड़ेले मीठे जल से तरबतर।
आँखें तुम्हारे
दर्शन के लिए आतुर
जैसे मरती फसल के लिए
मेघदर्शन को आतुर किसान,
साँसों का हाल ......
फड़फड़ाते विहग जैसे
मानो अब उड़े कि अब उड़े।
लौटते हुए पदचाप
सुनने को अतिव्यग्र दोनों कर्ण
जैसे पकी फसल की बालियों को
खेत की मुंडेर पर
चुगना चाहती गोरैया
अब तुम लोट आना।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद (राज)

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