भरी-पूरी फसल

तुम्हारे हाथ से फेंका गया
रोटी का टुकड़ा
रोटी का टुकड़ा ही नहीं
वह भरी-पूरी फसल
जिसमें किसी का बहा है पसीना
लगी थी गाढ़ी कमाई का
मोटा हिस्सा।
उस फसल की बुवाई के साथ
बोये गए थे कुछ नर्म सपने,
कुछ आशाएँ
जो सालों से पूरी नहीं हुई,
फसल की गुड़ाई में
कुछ लोक-कल्याणकारी भावनाओं ने
कदम बढ़ाए थे।
तुम जरा इस रोटी के टुकड़े को
फसल के नजरिए से देख लेना,
तब हाथ रोटी के टुकड़े को फेंकने का
बेतुका निर्णय नहीं लेंगे। 

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद (राज)

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