अप्रासंगिक नहीं

दुनिया ने आदमी को
हाथी कहा....................
आदमी की काया
हो गई विशाल
वजन बढ़ गया 
वह दँतेला हो गया
उसकी कनपट्टियों से
बहने लगी मद की धार।
अब हाथी बना वह आदमी
सामने आने वाले को
अपनी विशाल काया से
निर्ममता से रौंदता चला जाता,
अपने विशाल दांतों से
हरे-भरे वृक्षों को
समूल उखाड़ फेंकता,
नहीं दिखाई देती
नर्म पौधों की फलटन।
त्रुटि की हुई अनुभूति
भरी दुपहरी
खोदना प्रारम्भ किया गया खड्डा
नर्म हथेलियों से
बंटी जाने लगी मूँज की रज्जु,
अस्मिता के लिए
उठाई जाने लगी  कुदाल
संगठन के लिए पकडे गए नर्म-नर्म तन्तु
रगड़ कर गर्म की गई हथेलियाँ
..........................................
आज भी ..........................................
यह सब अप्रासंगिक नहीं
आदमी को आदमी बनाए रखने के लिए ।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद

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