Monday, 18 March 2013

सभ्यों के वेश में .

सभ्यों के वेश में ,
मिलते हैं ,
हिंस्र वनेले पशु ,
जिन को अपनी ,
पैनी दाढ़ों को ,
गड़ाने की ही ,
लगी रहती है .

नरभक्षी व्याघ्र ,
को नरों के वध से ही ,
होती है संतुष्टि ,
ऐसे ही सभ्य वेश में छिपे ,
कुछ हिंस्र पशु ,
करते रहते हैं ,
उन अबोध का शिकार ,
जिन्हें अभी दुनिया का ,
और लहराते जीवन का ,
उत्सव-दर्शन
करना भी है पूर्ण शेष 
पर उन नराधमों को,
तिल-तिल कर अबोध को
मारने में संतुष्टि ही मिलती है.


ये नराधम पिशाच ,
या,
रक्त पिपासु हो कर ,
ले बैठे हैं ,
नागर जन का रूप ,
इसी रूप की शुचि अवनिका में ,
बहुत फर्क करते हैं ,
रिश्तों में ,
कुछ रिश्ते में ये पूर्ण समर्पित ,
कुछ में ,
इन का रूप नराधम का .

घर की चार दीवारों में ,
ये तिल-तिल कर मार रहे हैं,
उन को ,
जो उन के नहीं हो कर भी बने ,
सामजिक सरोकारों में ,
या,
विधि की विडम्बना में ,
ये नराधम शब्दों के ,
पैने सूये से ,
मन छेद रहे छलनी सा,
जिस के कारण मन का ,
कोने-कोने से रिस रहा .
संत्रस्त जीवन ,
हाय ! यह सब कितना ,
संत्रास भरा होता है .

क्या ?
हमने नहीं पहचाना ,
सभ्यों के वेश में ,
नराधमों प्रेतों को ,
हिंस्र निशाचरों को ,
फिर तो सच में ,
हम अपराधी हैं ,
नराधमों !
इस अपराध का
प्रायश्चित करने को ,
हम कृत संकल्प ,
क्या तुम भी ,
करना चाहोगे प्रायश्चित ,
या,
प्रतिशोध का कारण ही
रहना चाहोगे .

  - त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द.

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