Saturday, 30 March 2013

ख़त अपने वारिस होते हैं



जब भी तेरे ख़त आते हैं , ख़त में हम ही तो होते हैं
ख़त में मेरी सेहत ले के , बस चिंता के क्षण होते हैं

कागज़ के पुर्जे स्याही में  , दौलत के वे गढ़ होते हैं
भीनी गंध लिए आते ये , ख़त रिश्तों के पथ होते हैं

निर्जन औ अँधेरे घर में  , ख़त आये दीपक होते हैं
उत्सव पर्वों पे आते-जाते , सच में वे ही घर होते हैं

मैंने सब को कह डाला है , ख़त सारे निर्दय  होते हैं
ख़त  होते श्वांसो के जैसे ,  रुक जाये तो डर होते हैं

जब से जा के शहर बसे , ख़त मिलने दुर्भर होते हैं
बंटवारे जैसी चुभती बातें ,नस्तर जैसे स्वर होते हैं

कल ही तो चाचा जी बोले , ख़त बिना सूने होते हैं
दीवारें छाती चढ़ आती , ख़त अपने वारिस होते हैं


                                  - त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द.

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