Saturday, 9 March 2013

जिंदगी का हाट ही ना मिलता.

उम्र का दरिया बिखर जाता , यदि तेरा किनारा ना मिलता.
फिर ये दुनिया भी ना होती , जिंदगी का हाट ही ना मिलता.

तेरे पहलू में सिमट कर के , हर कोई खोलता अपनी आँखें.
ज़रा सा भी वो खिसक जाए , फिर कौन है जो यहाँ मिलता.

तू एक हौवा इस महफिल का , तेरे रंग जो हजारों पे हजार .
तेरे रंगों की होती ना बारिस , गुलशन गुलजार ना मिलता .

तू नूर है जो फैला हर ओर , जिस के लिए जुकता खुदा भी.
तेरी रहमते ना होती यहाँ पे,खुशियों का उजाला ना मिलता.

तेरे होठों पे देखी है हंसी ही , भले दिल में रहा दर्द का दरिया .
तेरी नर्मी के गलीचे ना होते, मुहोबतों का रिश्ता ना मिलता .

हर रूप में तेरे कदमों ने ही , मेरी जिंदगी को सदा ही निहारा.
ऐ नूर !मेरा क्या होता यहाँ पे , जो तेरा सहारा ही ना मिलता.


- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द .

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