Monday, 18 March 2013

बेटियाँ ! तुम नदी हो .

बेटियाँ बीच राह पड़ी ,
कोई निर्जीव ,
वस्तु नहीं है ,
या,
मात्र इस्तेमाल की ,
वस्तु नहीं है ,
जिसे मन चाहे ,
कर लिया इस्तेमाल ,
और मन चाहे ,
दुत्कार दिया ,
किसी बिस्किट के,
रेपर की तरह .

बेटियाँ जीवन का ,
वह उमड़ता श्रोत है ,
जिस के हर प्रवाह पर ,
जीवन ऊर्ध्वमुख होता है .
और ,
जीवन के उत्सव में ,
वह छंदोबद्ध सामगान की तरह ,
मुखरित होती है ,
लेकिन ,
जहां भी बहाती है ,
अपने गर्म-गर्म आंसू ,
तब ,
उस के आंसूओं की तपिश में ,
सब कुछ जल कर ,
भस्म हो जाता है ,
जैसे ज्वालामुखी के लावे में,
विशाल और वज्र से पत्थर भी ,
जल कर ख़ाक हो जाते हैं .

बेटियाँ ,
तुम नदी हो ,
नदी का तरह बहो ,
नदी अपने अवरोधों को ,
तोड़ कर बिखेर देती है ,
ठीक वैसे ही ,
तुम भी अपने अवरोधों को ,
छिन्न-भिन्न कर बिखेर दो ,
बेटियाँ ,
नदी अपने तटों को ,
देख कर गंदा ,
करती है कोप ,
और जल प्लावन में ,
सारी की सारी गन्दगी,
फेंक देती है ,
तटों से दूर ,
तुम भी अवांछित को हटा दो ,
आंसूओं को व्यर्थ ना करते हुए .

बेटियाँ ,
तुम एक बात ,
ठीक से समझो ,
जीवन के सृजन के लिए ,
पवित्र वातावरण के साथ-साथ ,
चाहिए ,
स्नेह और सम्मान का निर्झर ,
तभी तुम ,
पयस्विनी हो कर ,
कर सकोगी सृजन ,
मैं ,
हमेशा ही तुम को ,
भोली गाय की जगह ,
उमड़ती हुई नदी के रूप में ,
देखना पसंद करूंगा ,
जो जीवन के सृजन के लिए ,
आवश्यक रूप ले सके .

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द.

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