Saturday, 21 January 2012

कंकण प्रदान कर , कहने लगी जानकी,
                  वत्स स्वामी से कहना , सीता मरी जाती है.
जैसे कर सिक्ता धरी , धीरे से खिसकती है ,
                  वैसी ही है प्राण - दशा , अब  श्वाँस  जाती है.
अब न विलम्ब करो , तन जर्जर हुआ ,
                   पक्ष  सब  विलग  हैं ,  हंसी  उड़ी  जाती  है . 
आशा के ही बल पर , प्रतिदिन लड़ती हूँ ,
                   निगोड़ी ये मृत्यु मुझे , खींचे चली जाती है. 


राघव से दूर हो के , रोमावली त्रास भरा ,
                 जल से विलग हुई , मीन सम जीती हूँ.
दृष्टि मात्र राम को ही , खोजती ही रहती है ,
                 मरुस्थल में बावरी , मृगी सम जीती हूँ.
राम से बिछुड़ कर , मिली मानो रजनी ,
                 राम -राम रटती , चकोरी सम जीती हूँ .
वत्स प्रिय को बताना , जाने को आतुर श्वाँस ,
                 अविलम्ब राम देखूं , इसी आस जीती हूँ .


वत्स प्रिय को बताना , सीता सम धरा त्रस्त ,
                  सीता सह धरा के भी , उद्धार को आइये.
शोषण - दुराचरण , प्रसरित है लंका से ,
                  विश्व अति शोषित है ,शमन को आइये.
अस्त्र-शस्त्र रचना से , आतंकित विश्व है,
                  भयभीत प्रकृति की , मुक्ति हेतु आइये .
राजीव नयन पर , विश्व दृष्टि साधता है,
                  मूल्य युक्त जीवन के , सृजन को आइये.

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