Monday, 30 January 2012

सुग्रीव टहलते हैं , चिंतातुर होकर के ,
               ध्रूम ज्वाल उगलती ,यम - दिशा उग्र है   
हनुमान गये हुए , पक्ष पूर्ण रीत गया, 
               लौट कर आये नहीं , राम भी तो व्यग्र हैं . 
प्रतीक्षा रत रहना , अति कष्टकारी हुआ,
               राम से क्या बोलूँ अब ? प्रश्न ही तो वक्र है.
सुग्रीव ने सभासद , शीघ्र ही बुला लिये , 
               सभासद भागे आये , राजाज्ञा तो अग्र है.


सभासद जुटते ही , प्रश्न किया सुग्रीव ने,
               सीता शोध की प्रगति , मित्रवर कहिए .
हनुमान भेज कर , आप सब सो गये हैं ,
               सीता शोध शपथ की , गति अब कहिए.
राज अतिथि हैं राम , अपने ही तंत्र में ,
                आतिथेय रूप में ही , सीता उन्हें चाहिए.
मैने पाये वर वीर , राम-लक्ष्मण भ्राता को ,
                हस्त द्वय भर-भर , मित्रता ही चाहिए. 


तत्र वृद्ध सभासद , मिल कर कहते हैं ,
                 स्वामी यह आप द्वारा , व्यग्रता उचित है.
आप द्वारा जागरण , व्यर्थ नहीं जाएगा ,
                 सीता शोध योजना तो , पूर्व से रचित है .
मात्र एक पक्ष हेतु , हनुमान भेजे गये ,
                  हनुमान  आते  होंगे , उत्तम  पठित  है .
यम दिशा व्यग्र हुई , ठोस कोई कारण है ,
                   चर गये तट तक , दिशा परीक्षित है .

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