Saturday, 28 January 2012

गहन निशा में राम , गगन निहारते हैं ,
                    टिमटिमाते नक्षत्र , उनको चिढाते हैं .
तिर्यक मयंक देख , वाम भुज देखते हैं ,
                     रिक्त उसे पा कर के , आह भर जाते हैं .
आह सुनता अनुज , उठ कर बैठ जाए ,
                     अनुज से राम कहे , कपि नहीं आये हैं.
नित भू भ्रमण करे , आते-जाते रवि-चन्द्र ,
                      पर सखा सुसंदेश , काहे नहीं आते हैं ?


निर्मल चन्द्र ज्योत्सना , छाई हुई चहुँ ओर ,
                      मानो धरा मढ़ दी हो , स्वर्ण पत्र आभ से.
शुचि जल श्रोत बह , झर-झर नाद करे ,
                      मानो वीणा वादन का , प्रेम भरा राग है .
मंद-मंद वायु बहे , पत्र ताल देते जाते ,
                      शाखा झूम जाती मानो , रस पगा नाच है.
राम यह देख कर , अनुज से कहते हैं ,
                      सीता किस हाल होगी ? यही अनुताप है.


राघव को खिन्न देख , कहते हैं लक्ष्मण भी ,
                   कपिराज सुग्रीव को , निश्चिन्त ही मानिए.
हनुमान भेज कर , सौर तान सो गये हैं ,
                   हम  हुए  विस्मृत  हैं , कृतघ्न  ही  मानिए.
राज-पाट लेने हेतु , मित्र-रूप धर आये ,
                   राज - पाट ले  कर के , विमुख  ही  मानिए .
प्रभु का आदेश हो तो , झंकृत  करूं प्रत्यंचा ,
                    तात ! तब सुग्रीव को , सक्रिय  ही  मानिए .           

No comments:

Post a Comment