Friday, 14 September 2012

तेज-बल-शील लिए , राम का विराट रूप ,
                अरि जन के समक्ष , पूर्ण काल रूप है .
लेकर विकट धनु , करते संधान जब ,
                छोड़े गए तेज बाण , पूर्ण नाग रूप हैं .
यमदंड के समान , चलते तो रुके नहीं ,
                श्वांसों के शशक हेतु , दृढ पाश रूप है .
तात दशानन अब , अहंकार छोड़ कर ,
                सती सीता सोंप दें  , भगवान-रूप हैं .

जानकी प्रसन्न होगी , राघव प्रसन्न होंगे ,
                सीता-राम युगल से , क्षमा मांग लीजिए .
हो कर विनम्र आप , राम के समक्ष आप ,
                 उचित उपहार दे  ,  वय  मांग  लीजिए .
स्वर्ण मणि रजत से , वस्त्र और भूषण से ,
                 राघव को मान दे के ,  कृपा मांग लीजिए .
उमापति देख रहे , राम की लीलाएं सब ,
                 राम  करुणावतार ,  दया  मांग  लीजिए .

रावण उखड कर , कह पड़ा सभा मध्य .
                 अधम निशाचर हो , कटु वाणी रोक लें .
वर्ण के विरुद्ध हो के , करते प्रलाप अद्य ,
                 शठ निशाचर हए  , अरि भाव रोक लें .
नृप का विरोध किया , शासन विरोध किया , 
                 दंड अनुमान कर , राज - द्रोह रोक लें .
व्यवस्था विरोध करो  , गति अवरुद्ध करो ,
                 विभीषण सह्य नहीं , काल - दंड रोक लें .

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