Monday, 17 September 2012

कुछ तो बोलो , चुप क्यों रहते ?

कुछ तो बोलो ,
चुप क्यों रहते ?
चलने पर पैरों के
नीचे आती जैसे ,
चरमर-चरमर ,
रेत बोलती ,
वैसे बोलो तो
कुछ मैं पावन जानूं .

आँखों में अश्रु ,
लिए हुए तुम ,
दबे जा रहे ,
पीडाओं का
लिये पहाड़ ,
चुपके-चुपके ,
जोर लगा कर
बाहर आना ,
जैसे धरती में
दबे बीज का ,
अंकुवा बन कर ,
बाहर आना.
तुम भी
बाहर आओ तो
कुछ मैं पावन जानूं .

वो आते हैं ,
अभिनेता से ,
अभिनय करते ,
अपने बनते.
कुछ विश्वास,
और -
दिलासा देकर ,
तेरी झोली में ,
हाथ डाल कर ,
जो भी मिलता ,
ले कर वो तो ,
चलते बनते.
तू है कि बस ,
लुट जाने का ,
रोना रोता ,
पता नहीं क्यों ,
रक्त तेरा है ,
इतना शीतल ,
चूल्हे पर चढ़ी ,
दुग्ध-भगोनी ,
जैसे उफने तो ,
कुछ मैं पावन जानूं.

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