Friday, 7 September 2012

सर्व हित चाहता हूँ , देता परमार्थ हूँ .

प्रभु नम्र निवेदन , आप के समक्ष है ,
                सत्य यह रक्ष-राज , लंका अपराधी है .
सीता हरी हुई आई , विपदा भी साथ आई ,
                वानर ने आ कर के , उधम मचाई है .
वीर कई मारे गए , हाथ से तनय गया ,
                तुस सम फूँक कर , लंका को जलाई है .
रामदूत लौट गया , सीता सहिदानी सह ,
                राम ने सीता के हेतु , वाहिनी चढ़ाई है . 

विभीषण कथन से , लंकापति काँप गया ,
                उदधि लहर मानो , काट गयी कूल को .
हो कर के सरोष वो , अनुज पे चढ़ कहे ,
                समझ में आता मुझे , तुम प्रतिकूल हो .
लंकेश के छत्र तले , नित प्राण धरते हो ,
                दृष्टिहीन  हो  कर के , कर  रहे  भूल हो .
विमुख हो कर बंधु  , मृत्यु ही बुलाते हो ,
                मंत्रणा स्वीकार वही , मम अनुकूल हो .

विभीषण हाथ जोड़ , सभा मध्य कह चले ,
                कृपा कर सुन लें जो , कहता हितार्थ हूँ.
प्रतिकूल न मानिए , वो अनुकूल जानिए ,
                राज अधिकारी भी हूँ , कहता धर्मार्थ हूँ .
प्रभु के ही छत्र तले , प्राण नित पुष्ट करूँ ,
                छत्र  यह  पूर्ण  रहे , गूढ़  चिंतनार्थ  हूँ .
आगत ये मित्र कहे , मंत्रणा उचित पर ,
                सर्व  हित  चाहता  हूँ , पाता  परमार्थ हूँ .











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