Sunday, 23 September 2012

सच! कहाँ रहते हो ?


सच ! कहाँ रहते?
घर-परिवार ,अन्दर-बाहर ,
तन में,मन में,बुद्धि-बल में ,.
पर,
ये सब तो बिखरे है ,
किंचित इन में प्राणों को सींचूं .

जन में ,गण में ,उपवन में ,
शहरों - कस्बों या ग्रामों में ,
पर ,
ये सब तो अस्त-व्यस्त है ,
किंचित इन को किरण दिखा दूं .

शैशव-कैशोर्य-योवन में ,
प्रौढ़ता या जरावस्था में ,
पर ,
ये सब तो बहुत डरे हैं ,
किंचित इन को निर्भय कर दूं .

लेखन - चिंतन - गायन में ,
आख्यायन या चित्रायन में ,
पर ,
ये सब तो अलग-थलग है ,
किंचित इन को संयोजित कर दूं.

तर्कों - वाणी - प्रमाणन में ,
रीति-नीति-छंदानुशासन में ,
पर,
ये सब तो वाग्विलासी हैं ,
किंचित इन को जीवन दिखला दूं .

ध्यान - धारणा - समाधि में ,
आवर्तन-परावर्तन-पलायन में ,
पर,
ये सब तुझ से बहुत विमुख है ,
किंचित इन को दिशा दिखा दूं .

नव अंकुरण के उल्लास में ,
श्वांसों के तू मुक्त विलास में ,
पर,
ये सब तेरा मूर्त रूप है ,
किंचित इन से ही झोली भर लूं.

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