Saturday, 22 September 2012

तब तक खोल चलूँ वे खिड़कियाँ .


   मैंने चाहा खुल जाए ,
          बंद पड़ी
     कुछ खिड़कियाँ .
हर खिड़की से चेहरा झाँके  ,
चेहरा देखे चलती गलियाँ .

   बंद कपाटों के पीछे तो
          सिसक रही
        बस सिसकियाँ
हर सिसकी में अपना रहता ,
अपना मांगे अपनी खुशियाँ .

     सतरंगी पंख फैलाये ,
            उड़ना चाहे ,
         कुछ तितलियाँ .
नम्र पवन अब देती निमंत्रण ,
देती निमंत्रण कोमल कलियाँ .

   आती होगी तुम को भी ,
          मीठी-मीठी ,
         कुछ हिचकियाँ ,
समझ लेना अपना ही भूखा,
झूझ रहा कर के मधुकरियाँ.

    दर्द ह्रदय में करवट ले के
             तीखी काटे
           कुछ चुटकियाँ ,
तब साथ मेरे तुम चल सकते हो ,
तब तक खोल चलूँ वे खिड़कियाँ .

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