Friday, 16 September 2011

वेतन सारा रीत गया ,


महीना बीता ना बीता,                 
वेतन सारा रीत गया ,                       
                                                  
फीस-ड्रेस ,पुस्तकें-कॉपियां,                       
लेकर  बटुआ  रीत   गया.                      
मुन्ने का बस्ता बाकी है,
मुन्नी की सेंडिल बाकी है,
जितना चुकता होता है,
उतनी ही  राहत होती है,
लेकिन-
एक घड़ी बीते ना बीते.
चुल्हे की चिंता होती है,
जैसे दुर्वा के कटते ही ,
नव  दुर्वा आ जाती है.
हाय! ऐसे ही दौड़-भाग में,
जीवन सारा रीत गया.


महीना बीता ना बीता,
वेतन सारा रीत गया ,

राशन-पानी,दूध -चाय ,
लेकर  बटुआ रीत गया.

अम्मा की ओषध लानी  है ,
अब्बा  की सुंघनी लानी  है,
पत्नी की साड़ी जीर्ण -शीर्ण,
उसकी भी साड़ी बदलानी है,
लेकिन दिन बीते ना बीते
चिंताएं बढती जाती है,
जैसे सूखी  घास की गठरी ,
चिंगारी लगते ही जल जाती है,
हाय! मरुस्थल में झुलसते ,
जीवन सारा रीत गया.

महीना बीता ना बीता,
वेतन सारा रीत गया ,

नल-बिजली ,अखबार- टेलीफोन ,
लेकर  बटुआ रीत गया.

पहले का उधार  देना है,
घर का भाड़ा भी देना है,
बरसाती मौसम में  भीग  गया,
अच्छा  सा छाता लेना है,
लेकिन दुकान की सीढ़ी पर,
राशन की याद आ जाती है,
जैसे  खुले किनारे को,
लहर काटती जाती है.
हाय! अभाव-समझोते में ,
जीवन सारा रीत गया.


महीना बीता ना बीता,
वेतन सारा रीत गया ,







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