Wednesday, 21 September 2011

सावन के अंधे को, हरा ही हरा , नज़र आता है.

कोयल !
अमराई में रहकर ,
अमराई से मद भरे ,
गाती हो गीत ,
या-
हरे भरे नीम की ,
पकी-पकी निम्बोरियों से,
रखती हो प्रीत.

परन्तु-
नहीं करती हो,
उन पेड़ों की बात ,
जो अहर्निश उतारे जा रहें हैं,
मोत के घाट .

क्योंकि-
तुम ने पीड़ा का ,
एक भी क्षण ,
नहीं  भोगा है,
और '
एक भी अश्रु-कण ,
नहीं छलकाया है.

इसीलिये कोयल !
तुम्हारी बोली में ,
रस भर-भर कर ,
छलक आता है,
ज्यों-
सावन के अंधे को,
हरा ही हरा ,
नज़र  आता है.

2 comments:

  1. आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है के आपकी यह विशेष रचना को आदर प्रदान करने हेतु हमने इसे आज ३ जून, २०१३ के ब्लॉग बुलेटिन - भूली कहावतें पर स्थान दिया है | बहुत बहुत बधाई |

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  2. तुषार राज रस्तोगी जी !
    सस्नेह नमस्ते । आपको हृदय से धन्यवाद। ।

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