Saturday, 17 September 2011

महंगाई सुरसा जैसे , सब को ही वो लील रही है.

महंगाई सांपिन जैसे ,
सब को  ही वो  डस रही है .


रोटी है तो प्याज नहीं ,
प्याज  हाथ तो मिर्च नहीं,
रोज दिहाड़ी जाने वाला,
अपनी रोटी को रोता ,
भूखा  उठता,भूखा जाता ,
आधा भूखा ही सो जाता 

सुबह जाग में ही मिल जाती,
लप-लप  करती जिह्वा को,
महंगाई सांपिन जैसे ,
सब को  ही वो  डस रही है.

दुपहिया में तेल नहीं,
पैदल चलना  खेल नहीं ,
बाबू चश्मा पोंछ  रहें हैं ,
केवल बगलें झाँक रहें हें,
भावज की आधी सूची बाकी है,
घर पर सिर फुटव्वल  बाकी है.

दरवाजे पर पहरा देती ,
लप-लप  करती जिह्वा को,
महंगाई डायन जैसे ,
सब को ही वो कील रही है.

बिजली महंगी ,पानी महंगा ,
आने-जाने पर भाड़ा महंगा,
घर बनाना दूर की कोड़ी ,
पढ़ना -पढ़ाना और भी महंगा,
ऋण की नित नयी मार से ,
घर का  छकडा टूट गया  है.

दसों दिशाएँ दौड़-दौड़ कर  ,
लप-लप  करती जिह्वा को,
महंगाई सुरसा  जैसे ,
सब को ही वो लील  रही है.

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