धवल हंसों की पाँत

सभी कुछ जानना
जरूरी होता नहीं है,
अपूर्ण परिचय से भी
यदि आगे
बढ़ा जा सकता है,
तब सब कुछ
जान लेने की
व्यग्रता में किया गया
उचित नहीं है पागलपन।
अज्ञात को ज्ञात में
परिवर्तित करने की
व्यग्रता ने,
छीन लिया हमसे
नव दिवस का छोर,
छीन लिया हमसे
साँसों का झीना डोर ,
छीन लिया हमसे
सरस भाव का कोर,
छीन लिया हमसे
मधुर जीवन का स्रोत।
हम हठीले भाव को
दो गज जमीन के नीचे
दबा कर
उस पर उगा दें
प्रेम के पुष्प कोई चार,
फिर-फिर छिटक दें
शीतल करुणा की फुहार,
जिससे सघन होगा
जीवन क्रियाओं का
कुसुमित उद्यान।
कुसुमित उद्यान देगा
अपूर्ण परिचय को
कुछ नया विस्तार,
पल्लवित होने को आधार,
जहाँ होंगे
कुछ राग और विराग,
जहाँ पथ पर मिलेंगे
कुछ धवल विश्वास,
जहाँ पार्श्व से प्रकट होंगे
जिजीविषा के दृढ़ भाव
जैसे अचानक शीत में
प्रकट होती
धवल हंसों की पाँत।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द (राज.)

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