सभी के लिए

आज मैं जहां हूँ 
कल वहाँ से बढ़ जाऊं 
मेरे पैरों को 
आगे बढाने के लिए बिजलियाँ 
मचलती हैं I
मैंने बसंत में 
पहली सांस ली 
मेरी धड़कन 
वासंती मौसम के लिए 
धड़कती हैं I
मेरी दुनिया में 
फसलें झूमी है 
आज नई फसलें 
कागज़-कलम का बल लिए 
लहराती हैं I
होंसले की 
थाह इस तरह लो 
जहां भी नहीं है न्याय 
मेरी लड़ाई अनवरत 
चल पड़ती है I
मेरे प्यार का 
दायरा छोटा नहीं समझो 
जो भी चारों ओर बिखरा है 
सभी के लिए 
मीठी बरसात  बरसती है I
-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द. (राज.


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