प्रतिध्वनि

पहाड़ी घाटियों के
मध्य खड़े होकर
लगाई गई पुकार,
प्रतिध्वनि के रूप में
लौट कर आती है, 
इसके यह
मायने नहीं कि
अकेलापन
हुआ समाप्त ।

अकेलेपन को
समाप्त करने के लिए,
घाटियों से बाहर
बस्तियों के पास
पहुंचना होगा,
किसी को संबोधन
देना होगा,
विश्वास की दुनिया में
श्रद्धा का
जोड़ना होगा
स्नेह सूत्र ,
जैसे जोड़ता है सूत्र
सर्पिणी के पाश में
कसमसाता जीव
कैलास बसे
निरंजन से।

नेह-सूत्र के
बंधन में आवश्यकता
विवशता की नहीं होती,
आवश्यकता
विश्वास और प्रेम की
होती है,
खेद है कि
हमारे हाथों से
प्रेम और विश्वास
ऐसे फिसले
मानो नदी के चिकने
काई सने घाट से
साबुन की
गंध सनी
टिकिया फिसली।

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।

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