प्रिये! तुम नदी सी

प्रिये! तुम नदी सी
निर्मल और मधुर जल से
परिपूर्णा तुम,
प्रिये! तुम नदी सी
निरंतर प्रवाहिता गति से 
वेगवती तुम,
प्रिये! तुम नदी सी
सृजन से जीवन दायिनी
वत्सला तुम.
प्रिये! तुम नदी सी
यह तुम्हारी प्रकृति,
विनत हूँ तुम्हारे प्रतिI
प्रिये! मैं मानता हूँ
मैं समन्दर
मेरा अस्तित्त्व क्षार से परिपूर्ण,
स्मरण रखना
यह क्षार आया था
तुम्हारे प्रवाह के सह,
प्रिये! मैं मानता हूँ
मैं अपनी जगह स्थिर
स्मरण रखना
सदा तुम्हारी प्रतीक्षा में,
प्रिये! मैं मानता हूँ
मेरे तट हैं उद्दाम और अल्हड,
इसलिए कि-
तेरे वत्स आपाधापी के बाद
कुछ क्षण मेरे यहाँ
फिर बचपन जी लें,
प्रिये! यह मेरी प्रकृति
जिसके कारण बन जाती
तेरे लिए ही
अनगिनत संभावनाएंI
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द ( राज )

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