Thursday, 8 December 2011


राम चरणानुरागी , त्रिजटा यों कहती है,
                     खुद को संभाल बेटी , काहे खिन्न होती हो. 
आप से विलग हो के, राम भी वियोगी होंगे ,
                      एक प्राण होकर भी , काहे भिन्न होती हो.
माता कह बुलाती हो , तिस पर रुलाती हो ,
                       मेरी वय भी तेरी हो , काहे छिन्न होती हो.
किंचित विश्राम ले लो, अल्पाहार ले आती हूँ ,
                       राम है हरि-स्वरूप , काहे चिन्त्य होती हो

मंद-मंद वायु बहे, द्विज साम छंद पढ़े.
              सती सीता कहती है ,हाय ! मैं अकेली हूँ. 
एक-एक क्षण मुझे , संवत्सर सा लगता,
              नीरवता  कचोटती , पीड़ा की  सहेली हूँ .
कपि  क्षण वर जान ,  मुद्रिका को डालते,
              देख मुद्रा सती चीखी ,प्रिय !मैं अहेली हूँ .
कौन-कौन यहाँ कौन ,राम- मुद्रा कौन लाया ,
               सत्य यह या माया है ?हाय!मैं पहेली हूँ.

श्रद्धा-सह सम्मुख हो, तत क्षण हनुमान ,
               विनीत भाव से कहे , अम्ब !तव दास हूँ .
मुद्रा का वहन कर ,राम से ही प्रेषित हूँ ,
               आप को ही शोधता , आपके ही पास  हूँ
तव नायक रत हैं , सत्य की प्रतिष्ठा हेतु , 
               राम के उद्देश्य हेतु , कार्य का विकास हूँ .
मायावी नहीं  मानिए , आंजनेय शाखामृग,
                राम-भक्त हनुमान , राम का विश्वास हूँ.

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