Sunday, 11 December 2011

क्षमा करें कपि वर, लंक-देश नृप भ्रष्ट ,
                  तैसा ही है जन-वृन्द ,  संदेह सहज है .
माया की प्रतिष्ठा यहाँ , असत्य ही सर्वत्र है ,
                  साधु पर प्रश्न चिह्न , लगाना सहज है. 
पग-पग मूल्य-क्षय , मर्यादा है तार-तार ,
                   सर पर भय-भाव , चढ़ना सहज है.
ऐसे वायु-मंडल में , श्वांस लेना दुर्भर है,
                   राम के वियोग में तो ,मरना सहज है.




खिन्न ना हो महतारी, तव वत्स उपस्थित ,
                  अविलम्ब लौटता हूँ, स्वामी शीघ्र आयेंगे. 
मूल्यों की प्रतिष्ठा हेतु ,त्रासदी के  अंत हेतु ,  
                   देवी  तव  मान  हेतु  , प्रभु  अत्र  आयेंगे .
धर्म-प्रति ग्लानि को , समूल नष्ट करने हेतु ,
                   शुचि  ध्वज आरोहण ,  भव - धन  आयेंगे .
दशग्रीव रोंद कर  , भव कर थाम कर  , 
                   बनने संयोगी  हेतु  ,  तव  प्रिय  आयेंगे. 

कपि राज वचन तव , मम हित अनुकूल ,
            मरू-भू में मिला मानो,शुचि जल श्रोत हो.                 
अतीव सुखद हुआ , राम का विश्वस्त यहाँ ,
            निर्धन को मिला मानो, अर्थ युक्त कोष हो.
मूल्य की प्रतिष्ठा हेतु , प्रिय अत्र आयेंगे,
            वत्स तव कथन तु , पूर्व का उद्घोष  हो.
रोंदा जाए दशग्रीव ,  राम को उचित होगा ,
            प्रिय कैसे रहते हैं , कहो तो संतोष हो .
                  
महतारी कैसे कहूँ ? राम के व्यवहार को ,
              वियोगी बन रहते, आप के अभाव में.
दिवस प्रारम्भ से वो , खोजते हैं जहाँ-तहाँ ,
              नाम ले पुकारते हैं, आप के प्रभाव में .
रजनी व्यतीत होती, अनुज सह चर्चा में ,
              हर चर्चा रंगी होती, आप के सुभाव में .
पथिक से पूछते हैं , खेचर से पूछते हैं,
              शून्य में ही ताकते हैं,राम के स्वभाव में .
                             
               



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