Tuesday, 20 December 2011

वनपाल मिल कर , संगठित  हुए सभी ,
                 सब मिल वानर को , वन से  हटाते हैं  .
कपि श्री वहाँ किसी से  , बांधे नहिं बंधते हैं ,
                 दैत्य धूलि चाटते हैं , कुछ मारे जाते हैं .
क्षण भर में ही वन ,  क्रंदन से भर गया,
                 कुछ  सिर धुनते हैं , कुछ भागे जाते हैं.
लंकेश सम्मुख कहे , स्वामी क्षमा कीजिए ,
                 मीचु सम कपि आया ,रक्ष फाड़े जाते हैं .    

वृत्तांत श्रवण कर  , दशग्रीव चिंतातुर ,
                 भेजता है निशाचर ,सुभट व मल्ल को .
दैत्य देख कपि श्री को , उपहास उड़ाते हैं ,
                 अरे यह तुच्छ जीव , उचित चर्वण को. 
कोई कहे रज्जु लाओ ,  ले चलो सुबंधन में,
                 स्वर्णिम गात इसकी , उचित रंजन को.  
कपि क्रुद्ध  होते हुए ,  विटप से कूदते हैं ,
                  ठोर - ठोर हूंकते  हैं ,पीसते  रदन  को .
                 
जातुधान सैन्य दल, छिन्न-भिन्न होकर के,
                   कहता लंकेश से है ,  रक्ष  मारे गये हैं.
शाखामृग गुरुत्तर , निर्भय है बलशाली ,
                   बंधन नहीं लगते हैं, रक्ष  काटे गये हैं.
विद्युत वेग धावता , यकायक दृष्ट होता ,
                   भीमकाय रूप लेता, रक्ष  रोंदे गये हैं.
पद-तले चाँप कर , कई वीर खींच दिये ,
                   हाय !दो-दो अंश कर , रक्ष फेंके गये हैं.

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