Tuesday, 13 December 2011

सुनते ही कपि श्री को ,जानकी विलाप करे,
                हे ! राघव  जानती हूँ , दुखी  कर  आई हूँ.
मेरे पीछे देवर हैं , यह तो संतोष है .
                उनके वात्सल्य को भी,छीन कर आई हूँ .
लौटूं तो भी कैसे लौटूं ? मध्य में यह वारिधि ,                 
                भाग्य  अपने  कर  से  , फोड़ कर आई हूँ  
शायद ही आहार को ,  लेते होंगे समय से ,
                हाय रे !व्यवस्था सारी ,तोड़ कर आई  हूँ.

जानकी विलाप सुन , कपि- नेत्र  भर कहे ,
                शांत रहो माता अब , क्लेश नहीं कीजिए.
प्रभु और लक्ष्मण की , सेवा में सुग्रीव दल ,
                 परिचर्या सुन्दर  है , खेद  नहीं  कीजिए  .
मुद्रिका को धार कर , राम हेतु सहिजानी ,                 
                  मुझको प्रदान करें , भ्रम नहीं कीजिए .
मर्यादा के  बन्ध लगे , न तु लेके चला जाऊं ,
                  दशग्रीव मत्सर सम , शंक नहीं कीजिए.

अरे वत्स !अति भोले , तुम अति कोमल हो ,
                   दशग्रीव  अति  दुष्ट , सुभट से युक्त है.
कई क्रूर मल्ल यहाँ , महाकाय -विकराल ,
                   ऋक्ष - वानर सरल , लघुता से युक्त है
देव - नर- नाग सब  , दमित हैं राक्षसों से ,         
                    कोई नहीं सहाय्य है ,बंधन से युक्त है 
कैसे पार पाओगे , यहाँ रक्ष छलि - बलि ,
                    तिस पर मायावी हैं,साधन से युक्त है.                

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