पसरी दुर्वा,

पसरी दुर्वा,
हरित-पीत वर्ण,
जैसे जीवन .
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फैली दुर्वा ,
रेशा-रेशा फैलाए,
ऐसा जीवन.
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पौर-पौर पे,
दुर्वा से दुर्वा फैली,
जागा जीवन.
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शीर्ष जुकाए ,
सब सहती दुर्वा,
सादा जीवन .
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उठी धरा से ,
दुर्वा पूजा में आई,
प्यारा जीवन .
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-त्रिलोकी मोहन पुरोहित

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