Thursday, 8 November 2012

मेरे प्यार का , इम्तिहान न लो .


मेरे प्यार का ,
इम्तिहान न लो ,
चलो भी यहाँ से ,
कुछ देर घूम आयें,
और
छोड़ दें ,वे मील के
पत्थर सी जमी हुई
हमारी दुरभिसंधियाँ .

यह ठीक नहीं किया ,
रो-रो कर बहा दिया ,
सितारों सी चमकती ,
आँखों का अंजन.
खुल कर बिखर गयी,
मसृण काली केश राशि ,
जैसे बिखर चली हो ,
गाँव पहुँचाने वाली ,
वक्रिल पगडण्डीयाँ ,
उन्हीं  में उलझ कर ,
मैं तो रह गया हूँ ,
चलो कहीं चलते हैं ,
जहां छूट जाए उलझन ,
मिले कोई ठोर-ठिकाना.



तुम्हारे प्रश्न हमेशा ,
बहुत ही छोटे होते हैं ,
पर वे सब के सब बहुत
जटिल हुआ करते हैं ,
जैसे उलझे हुए ,
लाल-पीले गुडिया के बाल,
वे उत्तर से पहले ही ,
मेरे मुंह में गुल जाते हैं,
छोड़ जाते हैं मधुर स्वाद.
मैं मुग्ध हो कर तुम को ,
बस देखता ही रह जाता हूँ ,
और ,
तुम उसे मान लेती हो ,
अपनी ही अवमानना ,
चलो भी अब ,
तुम्हारे सभी प्रश्नों का हल ,
कहीं एकांत में बताता हूँ ,
यहाँ बहुत भीड़-भक्का है,
तुम बहुत शर्म कोगी.

हमारी दुनिया में ,
नित होते रहते हैं ,
छोटे-बड़े नाटकीय खेल,
हम हैं कि ,
हर रूपक में.
जोर-शोर से अपनी भूमिका,
कस कर खेलते हैं ,
लेकिन,
हर रूपक का अंत ,
बहुत त्रासद होता है ,
और ,
सँभलने से पहले ही,
नव भूमिका में हमें ,
धकेल दिया जाता है ,
अंत में,
पुनरावृत होता है ,
फल के रूप में त्रासद अंत ,
चलो भी कहीं अलग ,
जहां हम ही रचें कोई ,
छोटा सा मधुर  रूपक ,
त्रासद अंत से विलग .

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