Wednesday, 7 March 2012

चाँद !
तुमने देखें हैं ,
जिंदगी के कई,
उतार चढ़ाव .
कभी उजाले में ,
कभी अँधेरे में .
कभी अमावस में ,
कभी पूर्णमासी में .


होली के बारे में ,
पूछता हूँ विचार,
क्या तुम बोलोगे ?
या , 
किसी मोनी बाबा जैसे ,
हमेशा की तरह चुप ,
या ,
भीष्म की तरह खा ली ,
"तटस्थ "रहने की कसम .


चलो भी अब बताओ -
होली की तरह ,
कौन जलता है ?
और-
प्रह्लाद की तरह,
कौन बचता है ?

हे ! सोंदर्योपासक रजनीकर ,

तुम क्यों कर बोलने लगे ,
तुम बोलोगे तो खो ही दोगे,
मिलने वाली सारी की सारी ,
उपाधियाँ , उपमाएं ,
और -
कवियों की वे कवितायें ,
जिनमें तुम केंद्र में ,
रखे जाते हो ,
और 
तुम में देखते हैं उनकी प्रेयसी ,
या, 
कोई वात्सल्य विदग्धा माँ,
तुम्हें देख कर याद करती है,
मथुरा गए अपने लल्ला को ,
या  ऐसा ही कुछ और भी ,
जो तुम्हें रुचता है .


कोई बात नहीं सुधाकर ,
सोचना इस बारे में ,
रंग इतने फीके क्यों हो गए ?
मीठा बेस्वाद  क्यों हो गया ?
नमक बहुत तीखा क्यों हो गया ?
आम आदमी 
होली की तरह जलता क्यों ?
और -
नेता प्रह्लाद की तरह बचता क्यों ?

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