Sunday, 18 March 2012

ग्रीष्म तेने,
आगमन को,
हो के मुखरित 
कह दिया है .
शरद से जो ,
स्वच्छ नभ था,
बवंडरों  से ,
भर दिया है .


दो दिवस से ,
जल रहा तन ,
घोर ज्वर जो ,
आ रहा है .
चार पाई से ,
चिपक कर ,
समय युग सा ,
कट रहा है .


निर्दयी ओ ! 
ग्रीष्म तुमने ,
धूल-धक्कड़ . 
भर दिया है.


देख जाते ,
घर किसी के ,
क्षुद्र घंटी ,
हम बजाते .
विनय सह ,
हम क्षेम पूछें ,
आगमन के ,
कारण बताते .


विस्तारवादी ,
ओ ! ग्रीष्म तू ,
खिडकियों से ,
भर गया है .


मेज पर  ,
रचना धरी थी  ,
उड़ा-उड़ा कर ,
उल्लास करता.
तिपाई पर ,
ओषध धरी थी  ,
गिरा-गिरा कर ,
उपहास करता .


शोषकों सा ,
ग्रीष्म बन तू,
ज्वर-ग्रस्त मुझ पर 
छा गया है.


गलत तेरा , 
आचरण यह ,
मुझ को यह ,
स्वीकृत नहीं.
निर्लज्जता से,
सना तेरा यह
यह आगमन , 
अधिकृत नहीं.


बेखबर ,
ओ !ग्रीष्म तू ,
कविता की धार पर ,
चढ़ गया है.


गीत गाती ,
प्यार से , 
कविता प्रथम,
अति नम्र बन .
अधिकार के ,
अवरोध पर ,
कविता काटती ,
अति क्रूर बन .


ग्रीष्म तेरा दंड यह , 
प्राण के उपक्रम सजा ,
कवि कुटिर में,
अहम् से जो भर गया है.

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