Friday, 9 March 2012

हवा मैं फैली है , 
डर की गंध ,
बहुत भयावह .


अम्मा डरती है ,
छुटकी स्कूल जो गयी है ,
बीस बार पूछती है -
"छुटकी आ गयी क्या" ?
और -
उकता कर कहता हूँ -
"आ भी जायेगी अम्मा ,
नाहक सर खाती हो".
अम्मा है कि-
हर बार उतर जाती है ,
छुटकी के लिए लड़ने ,
तब मैं समझ जाता हूँ ,
अम्मा ने पढ़ ली होगी  , 
कोई खबर ,
या, देखा होगा दूर दर्शन ,
और-
उसकी रूह फिर-फिर कांपी होगी .


अब्बा रोज सुबह उठ कर ,
बिना लांगा किये ,नहा लेते हैं ,
और ,
प्रारम्भ हो जाता है ,
उनका अनुष्ठान .
जब कि मैं 
जमा देने वाली सर्दी में ,
दुबका रहता हूँ रजाई में ,
अब्बा आकर अपनी ,
नर्म अँगुलियों को ,
मेरे भाल पर छू भर देते हैं ,
होठो से बुदबुदाते हैं ,
महामृत्युंजय महामंत्र .
क्योंकि ,
वे रोज सुनते हैं -
ह्त्या , अपहरण और लूट .


भैया को रोज 
सबसे पहले चाहिए ,
अखबार का वह पन्ना ,
जिस पर छपा होता है ,
ग्रह-गोचर और दैनिक भविष्य ,
और ,
चीफ की डांट पर ,दोड़ पड़ते हैं ,
झोला छाप ज्योतिष के पास ,
और ,
बदलते रहते हैं रत्न संयुक्ता मुद्रिका .


डर का है साम्राज्य ,
न जाने कब किस को ,
ले लेता है गिरफ्त में ,
जैसे श्येन छोटे पक्षी को.

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