Saturday, 31 March 2012

वीर-यूथ बढ़ कर , गाते हैं प्रयाण गीत ,
                लोक-नद बढ़ता है , अब इसे राह दो .
शोषण -विरुद्ध सब, जाति वर्ण भूत एक,
                हर - हर कर बढे , अब इसे राह दो .
लोक-शक्ति भवानी है , देववृत्ति  मांगती है .
                असुर सुधर जाओ , अब इसे राह दो. 
तृण  सब  मिलकर , रज्जू बन गज बांधे, 
                संगठन में शक्ति है, अब इसे राह दो.


शोषण व अत्याचार , खूब लोक में हुए हैं,
               अब नहीं होने देंगे , मुक्ति अधिकार है.
भौतिकता की चाह में , निर्मम हो मूल्य चांपे,
               हमें मूल्य चाहिए ही , मुक्ति अधिकार है.
अर्थवृत्ति प्रिय जिन्हें , अतीव  षड्यंत्र रचे ,
               उनके षड्यंत्रों से ही , मुक्ति अधिकार है.
लोक आज पीड़ित है , अर्थ जन मूल्य रुद्ध ,
               रावण की काराओं से , मुक्ति अधिकार है.


सीता सह  लोक-मुक्ति , राम करने आये हैं ,
                चलो साथी हम सब , रणोत्सव मनाते हैं.
नित्य मृत्यु भय ग्रस्त  , राम से अभय मिला .
                रण भेरी बज चली , रणोत्सव मनाते हैं.
धूलि से खिले हैं हम , धूलि ही बनेंगे हम ,
                सनातन सत्य लिए, रणोत्सव मनाते हैं.
परिवर्तन हेतु ही , राम शंख नाद करे ,
                क्रान्ति का आह्वान हुआ , रणोत्सव मनाते हैं.

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