Monday, 19 March 2012

मैं नदी सा , 
बन रहा हूँ ,
सतत बहता,
जा रहा हूँ .


दो कगारों, 
मध्य फैली ,
जिन्दगी ,
अनुशासना में,
रिस रहा है ,
प्राण मुझ से ,
निर्माण की ,
अनुपालना में.
रससिक्त होता ,
जा रहा  हूँ .
मैं नदी सा , 
बन रहा हूँ .



प्रवहमान भी ,
गतिशील भी ,
व्यक्तित्व की,
पहचान है ,
बहते जाना, 
बढ़ते जाना ,
नियति भी , 
सम्मान है .
सब में गुलता , 
मिल रहा हूँ .
मैं नदी सा , 
बन रहा हूँ .



अर्जन के सह ,
विसर्जन भी , 
तृप्ति के सह,
अर्पण  भी है.
गति के सह ,
गायन भी  है ,
मुक्ति के सह ,
बंधन भी है. 
नव सृजन को,
रच रहा हूँ .
मैं नदी सा , 
बन रहा हूँ .

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