Friday, 16 March 2012

दूर देश से ,
आने-जाने  वाले ,
थके-हारे ,ठहरो -ठहरो ,
मेरी मुंडेर पर ,
ओ !भोले विहग .


ओ ! विहग ,डरो नहीं ,
देखो भर दिया जल ,
भर दिया चुग्गा पात्र .
उड़े चले जा रहे हो,
एक देश से दूसरे देश,
दाना पानी के लिए ,
और तुम्हें ,
क्या चाहिए .


तुम्हारी इच्छाएं ,
हैं बहुत छोटी ,
और बहुत अल्प ,
इसीलिए ,
तुम हो पवित्र.
तुम्हें छूने को , 
करता है मन .


है ! उदार मना परिंदों ,
नहीं बाँध रखी सीमा ,
सब जगह ,
और ,
सभी को,
समझते हो अपना .
मुझे लगता है ,
यही है तुम्हारा,
सांस्कृतिक विधान.


यह बहुत उत्तम हुआ ,
तुम नहीं जानते ,
भाषाई दांव -पेंच ,
नहीं है तुम्हारा 
कोई घोषित विधान,
और ,
नहीं होती ,
मत आधारित राजनीति .


कभी -कभी अभाव ,
हो जाते हैं , वरदान ,
तुम्हारे ,
अभावों ने बचा लिया ,
द्वंद्व और द्वैत्व से ,
वर्ग-भेद और संघर्ष से .
बच गए ना ,
प्रकृति की दया से ,
अपने ही खून से ,
अपने ही हाथ रंगने से.


ओ ! विहग ,
तनिक रुक जाओ ,
दे दो मुझे भी,
अपना साहचर्य ,
मैं भी तुम्हारे साथ ,
मुक्त उड़ान ,
भरना चाहूंगा .





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