Sunday, 16 December 2012

कभी स्वीकार नहीं किया,



तुम ने मुझे ,
कभी स्वीकार नहीं किया,
बस , अपनी इच्छाओं से,
दे दिया रूप-आकार ,
क्षणिक प्यार ,
क्षणिक तिरस्कार.
कब तुम ने सुनी है ,
मेरे कोमल ह्रदय की धड़कनें ,
और कब समझी है , 
मेरी इच्छाओं की दुनिया,
क्योंकि,
तुम्हें अवसर ही नहीं मिला,
अपने से बाहर आने का.

तुम ने कभी जाना है,
तुमसे बाहर भी है ,
एक दुनिया,
जिसे जाने बिना ,
हर कोई है अधूरा ,
मेरी नजर में भी ,
तुम वैसे ही तो हो,
भले ही अपने अहं की ,
सम्पूर्ति में मानते हो ,
अपने को खरा-पूरा,
लेकिन सच यह है -
यह सब बहुत ही 
हास्यास्पद जीवन है,
जो है बिल्कुल आधा-अधूरा .

हमेशा मुझे माना है,
उपभोग की वस्तु ,
जितना उपयोग ,
और जैसा उपभोग ,
उसी अनुसार दिया है दाय ,
कभी स्नेह ,कभी तिरस्कार,
( उस में भी अपनत्व नहीं था )
तुम्हारे हाथों में ,
ताश की गड्डी की तरह रहा,
जी भर कर फेंटते हो,
पत्ते बाँटते हो,
रम्मी बनाने की चाहत में,
दगा भी करते हो,
बन जाती है रम्मी ,
तब चूम जाते हो ,
टूट जाती है रम्मी,
टेबल पर पटक जाते हो ,
यही तुम्हारे चरित्र का सच है .

हर रात तुम्हारी ,
अकेलेपन में गुजरती है ,
दिन अजनबीपन में,
गुजर जाता है ,
इस की वजह मैं नहीं .
एक बार छोड़ के देखो,
पत्तों की तलाश,
इक्का-बादशाह , 
बेगम-गुलाम,
नहला- दहला 
या,
जोकर का झंझाल.
मुझ में खोज के देखो,
अपना बिम्ब-प्रतिबिम्ब,
तब नहीं रहेंगे-
रातों का अकेलापन,
दिन का अजनबीपन.


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