Sunday, 23 December 2012

मील के पत्थर


मील के पत्थर ,
हुआ करते थे आदर्श,
आज ,
बीते समय की ,
हो गयी है बात.
मील के पत्थरों को ,
उखड़े हुए ,
और ,
देखा है ओंधे मुंह,
लुढ़कते हुए .

अब कोई पैमाना ,
कहाँ रहा है ,
विश्वसनीय और ,
पूरा प्रामाणिक ,
वे अब बदल गए हैं ,
और ,
अपना आदर्श ,
समय के साथ ,
छोड़ चुके हैं ,
जैसे छोड़ देता है ,
सांप अपनी केचुली,
या,
बढ़ती उम्र के साथ ,
तन छोड़ देता है ,
अपनी मुक्ता सी रवानी .

जरूरत है ,
समय के साथ ,
मील के पत्थरों ,
के बदलाव की ,
नए और प्रामाणिक ,
आदर्श पैमानों के,
ठोस प्रस्ताव की.
इस हेतु ,
कभी नहीं आयेंगे ,
आकाश से आदर्श ,
हमें बनाना होगा ,
या,
फिर से गढ़ना होगा,
आदर्श रूप ,
मील के पत्थर .

जमीन से उखड़े हुए ,
मील के पत्थरों से ,
उचित पैमाने की ,
आशा -प्रत्याशा ,
बिल्कुल है  व्यर्थ ,
फिर क्यों ,
चीख-चिल्लाहट में ,
बाधित होती है गति ,
स्वयं बन सको तो बनो ,
मील के पत्थर ,
और ,
जीवन पुष्ट हो कर
पा सके गति,
ठीक भरी-पूरी ,
नदी की तरह .

     - त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द .

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