सूरज योगी ,


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भोर के आते ,
चिड़िया नगमा गाती,
स्वस्ति वाचन .
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भोर चली ,
रक्तिम किरणें दे ,
सिद्धि-आसन. .
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सूरज योगी ,
धीरे-धीरे चढ़ता ,
सिद्धि-साधन .
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मध्य दिवस,
रवि बहुत खरा ,
मन्त्र-पठन
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संध्या के आते ,
रवि हुआ विनत ,
ये मुद्रा-ध्यान .
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धीरे से जाए ,
रवि अस्ताचल को ,
ये विसर्जन .
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गहन रात के ,
रवि शांत कक्ष में ,
करे सृजन.
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     - त्रिलोकी मोहन पुरोहित.

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