Sunday, 2 December 2012

शब्द-साधना मांगती

गंगा सम शीतल करे , शब्द नेह की धार .
तपे घृणा की आग में , शब्द हुए तलवार.

स्वर्ण-रजत के जोर पे ,किस ने पाया प्यार.
प्रेम - शब्द के जोर पे , प्यार करे व्यवहार .

शब्दों की सरिता चले ,खुलते विकट कपाट .
छैनी भी ठन - ठन करे , रचती रूप विराट .

शब्दों की विरुदावली , मम मुख बसो सदैव.
शब्द मुझे दाता दिखे , ब्रह्मा - विष्णु - महेश .

शब्द-साधना मांगती , सरल-सादगी-धार.
प्राण ज्यों ऊँचो चढ़े , ले अनुभव -विस्तार.

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित .

No comments:

Post a Comment