Thursday, 7 January 2016

हम कौन

जब हम अपना
शहर छोड़
होते हैं बाहर
हमें अपने लोग
करते हैं याद 
नियति की तरह।
कुछ की स्मृतियों में
हम आवश्यकता के जैसे
कुछ के लिए
हम साधन के जैसे
कुछ चाहते हैं
हम को दिनचर्या के जैसे
कुछ के लिए पीड़ा के चलते
हम प्रियतम के जैसे
कहीं सेतु से
कहीं ईंट-गारे के जैसे
परंतु हम ही नहीं जान पाते
आखिर कर हम कौन
स्वयं के लिए किसके जैसे?
त्रिलोकी मोहन पुरोहित ( राजसमन्द 

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