हमारी लड़ाई

सुनाई देती है
हर क्षण आहट
जैसे वे आ रहे हैं
पास..... पास और बिल्कुल पास
टटोलते हैं माहोल को 
तब होता है वायवी अनुभव
यही समय होता है
अभिव्यक्तिै के लिए खतरा
क्या कहें -
वे हैं या वे नहीं है?
मानो यह समय
बर्फ जमी ऊँची पहाड़ी के
शीर्ष पर पहुंचने का है
जहाँ ठहराव में भी
और उतराव में भी
हमारे जीवन के लिए
भरी हुई है चुनौतियाँ।
वे नहीं मिलते हैं
लाख कोशिशों के बाद भी
जबकि कहती है आहट
वे हैं आसपास ही
उम्मीद है कि
अब भी वे मिलेंगे
यह वैसी ही है उम्मीद
मानो जीर्ण-शीर्ण होकर
बंद पड़े थिएटर के सम्मुख
कोई थिएटर प्रेमी
आज भी फड़फड़ाते पोस्टर का
करता है इंतजार
अब सवाल यह है कि
उन्हें कोई समझाएगा
या हमें कोई समझाने का
उठाएगा बीड़ा ।
यह विचित्र लोगों का है देश
जहाँ प्रेम पर
होते हैं अलसुबह प्रवचन
लोग प्रवचन के साथ-साथ
करते हैं उसके निर्वहन का प्रण
लेकिन दिन के बढ़ने के साथ
आ जाते हैं वे आदिम अवस्था में
प्रिय की आहट और अस्तित्व
खो जाते हैं आदिम प्रवृत्तियों में
मानो भूचालन से मलबे के ढेर में
बच्चे के रंगीन खिलौने कहीं
दब से गए हैं
अंत तक रहेगी निरंतर हमारी लड़ाई
आदिम प्रवृत्तियों के विरुद्ध
प्रेम की विशुद्ध प्रतिष्ठा के लिए।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।

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