Thursday, 7 January 2016

अपनी ही तरह से



उदासियाँ पीछा ना करो हमारा
परछाई की तरह
हमसे कोई सरोकार नहीं
हमें मुक्त करो
अपने शुष्क बंधनों से
हमें भी जीना है
कुछ अपने लिए अपनी ही तरह से ।
डर और डर
बस चारों ओर डर
फैल गया हो मानो
बरसाती जलावन के दमघोंटू
मटमैले धुएं सा डर
नित्य भोर के धुले-धुले उज्ज्वल
नवल तारक के दर्शन से भी
दिवस कभी हमारा धवल नहीं होता
उदासियों अब तो अलविदा कहो ।
घर तो घर होते हैं
नहीं होते कारागृह
वहाँ संबंध तो संबंध होते
नहीं होते लोह-वलय
जिनकी छत कच्ची-पक्की होने पर भी
नहीं होती कभी असुरक्षित
लेकिन जब घर में ही
पैदा हो जाए कारा,
उग आते हों लोह-वलय,
फसल असुरक्षा की भर आए
तब धम-धम करती उदासियाँ
छाती पर चढ़-चढ़ आती
और निर्दय होकर पीसने लग जाती
मानो चलते कोल्हू में
काया तिलहन सी पिसती।
उदासी दूर रहो भी
हम अपरिचित
अच्छा हो कि अरे उदासियाँ
शुष्क पत्र सी गिर गिरकर
पदतल के नीचे
चरमर चरमर करती पिस ही जाओ
जिससे कुछ क्षण ही जी लें
खुशी-खुशी अपनी चेतनता से
कहीं दूर क्षितिज पार से
घड़ी की सुई सा
धूप का उज्ज्वल कतरा
चुपचाप सरक रहा है
समय नहीं है बहुत अधिक
उदासियाँ अब कहो हमें - विदा-विदा।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।

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