अभी जीना चाहता हूँ

उम्र के पड़ाव
फिसलते जा रहे
मुट्ठी में बंद
रजत रेत की तरह
परंतु प्रार्थना है दिनकर
अभी जीना चाहता हूँ
सभी के लिए।
खोल दिए
वातायन भी सायास
दूर तक
अवलोकन के लिए
परंतु दृष्टि
घायल विहग सी
अधमरी सी
थकी-थकी सी
खोज रही आधार
जीवन के पुनः पुनः
पल्लवित होने के लिए।
रवि तव दर्शन देता मुझे
नव - नव प्राण संचार
प्रार्थना है दिनकर
दिवस के आलोक के सह
घायल दृष्टि
स्वस्थ हो विकसे
रतनारे कमल की तरह
जिससे बन सकूँ कारण
लोक में सभी के लिए
प्रफुल्लित होने के लिए।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित।

Comments

Popular posts from this blog

सावन के अंधे को, हरा ही हरा , नज़र आता है.

ब्रह्म-राक्षस